अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


आई है दीपावली

   



 

माँ लक्ष्मी, माँ भगवती, कीजै कृपा गणेश ।
दीवाली पर दूर हों, मन के सभी कलेश ।।

द्वार रंगोली माँडकर, जोऊँ थारी बाट ।
मां लक्ष्मी धन-धान्य से, भरो सकल घर-घाट।।

तारों की बारात ने, गाया मंगल गान।
पहन अमावस सज गयी, दीपों का परिधान।।

थाली में दीपक सजे, धनतेरस के साथ।
पंच-पर्व मिलते गले, हाथों में ले हाथ।।

अलग-अलग हालात की, कैसे हो तफसील ।
इक धरती का दीप है, इक नभ की कंदील।।

इक-दूजे के साथ से, बदल गये हालात ।
दीप-दीप के मिलन ने, रोशन की तम-रात।।

- परमजीत कौर रीत
१ नवंबर २०१८

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter