अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


         दीप जलाएँ

   



 

भक्ति भाव जगाकर मन में
आओ दीप जलाएँ

रात अमावस का अँधियारा
सभी दिशाओं में फैला है
जैसे कोई रंग उजेरा
हुआ कालिमा से मैला है
रख दें दीपक एक जलाकर
सुन्दर जगमग निशा बनाएँ

ओंठों पर मुस्कान मधुर ले
दिया स्नेह का जले निरंतर
समरस हो जाएं सुख दुख में
आपस के मतभेद भुलाकर
पर्व रौशनी का है पावन
निश्छल मन से इसे मनाएँ

आधुनिकता के आकर्षण में
खो जाती पर्वों की गरिमा
जिनमें उलझे भूल रहे हम
भारतीय संस्कृति की महिमा
बहुत जरूरी है हर मन में
राष्ट्रप्रेम का भाव जगाएँ

आँखों में वैभव के सपने
और खुशी के आँसू लेकर
जीवन की समझें सार्थकता
साथ सभी के आगे बढ़ कर
जहाँ दिखे मुश्किल में कोई
बढ़ें मदद का हाथ बढ़ाएँ

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ नवंबर २०१८

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter