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          दीप जलता

दीप जलता, ओज बढ़ता
उजाला फलता
अँधेरों की पीठ पर
तो मूँग है दलता

हर्ष देता पवन को
अरमान को आकाश
हृदय में
हर धमनियों को दे रहा प्रकाश
कीट को जो भिनभिनाते
तेल में तलता

झोपड़ी में महल में
सबसे मुहब्बत है
दूर बिजली-निगम से
जिसको न निस्बत है
फ्यूज़ दुगुना-वॉट जो
तिल तिल नहीं गलता

धरती गले लगती गगन से
खुश हुआ तारा
पर्व ने हर शिशु की
मस्ती पे पुचकारा
पटाखों का मुँह तक यह
चूम कर चलता

ज्योति का उत्सव यहाँ पर
मौज मस्ती है
बात धन्ना की कहाँ
कल्लू की हस्ती है

वृक्ष है सद्भावना का
प्रेम से पलता

- हरिहर झा

१ नवंबर २०२०
 

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