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         सज रहे कंदील

आई दीवाली तो घर घर जल गए कंदील ये
चाँद को भी मात देते सज रहे कंदील ये

रात मावस की अँधेरा घोर घिरता सामने
पर विजय का दर्प लेकर लो जले कंदील ये

जो सजाए घर रहे वो ही सदा बाहर टँगा
ध्यान तो दे कर सुनों क्या कुछ कहे कंदील ये

आज मंहगाई के कारण आदमी बेहाल है
हो रहे बाहर पँहुच से क्या करे कंदील ये

सब अलग ही रंग के आकार भी सबके ज़ुदा
हैं सभी सुन्दर मगर आला बड़े कंदील ये

आप के आने से जगमग हो गयी हैं महफिलें
आप की आँखों से बेहतर क्या लगे कंदील ये

लो-'अमित'-अब-इस-दिवाली-हो-गयी-रोशन-गज़ल
जो नहीं हम कह सके वो गा रहे कंदील ये

- अमित खरे
१ नवंबर २०२१

     

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