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         चमक रही कंदील

नन्हा दीपक तम से लड़ता
चमक रही कंदील

तेज हवा से रक्षा करतीं
ममता की दीवारें
रंग बिरंगे इस मंजर पर
लक्ष्मी खुद को वारें
श्वेत रश्मि को सौ रंगों में
करती है तब्दील

धीरे-धीरे नभ तक जाकर
तारा बन जायेगा
भूली भटकी दुनिया को ये
रस्ता दिखलायेगा
टँगा हुआ है सुंदर सपना
पकड़े सच की कील

अखिल सृष्टि यदि राम कृष्ण से
ले लें सीता राधा
कभी न कोई युद्ध कहीं हो
कभी न रोए ममता
अहंकार में मतवाला जग
फौरन बने सुशील

- धर्मेन्द्र कुमार सिंह
१ नवंबर २०२१

     

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