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         जलने दो कंदील

मुट्ठी में है क़ैद उजाले तम है मीलों-मील
तनिक दूर है अभी सबेरा
जलने दो कंदील

महलों में हैं टँगी रोशनी चौखट हैं दमदार
रंग-रोगन को तरस रही है मिट्टी की दीवार
ऊहापोह में बीत रहा दिन
रात नयन के झील

रोज भयावह घटनाओं से आतंकित परिवेश
सीमाओं पर डटे सूरमा देते हैं संदेश
होगी विजय सुनिश्चित रण में
ठुक जाये जब कील
जलने दो कंदील

आशाओं के द्वार सजे हैं झिलमिल वंदनवार
उत्सव के पल आयेंगे ले खुशियों के उपहार
कंटक पथ पर चले पथिक को
दे दें थोड़ी ढील
जलने दो कंदील

- सुधा श्रीधर आचार्य

१ नवंबर २०२१
     

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