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         मनभावन है फूलझड़ी


झर झर झर झर जली जा रही
मनभावन है फूलझड़ी

हर आँगन की शोभा बनती
सब बच्चों बूढ़ों को भाती
फूल सितारों जैसे झड़ते
खुशियाँ जहाँ तहाँ बिखराती
मन ही मन माँ भी मुस्काती
दरवाजे पर खड़ी खड़ी

दीवाली का पर्व आ गया
पावन सा माहौल छा गया
दीपों की शुभकर माला का
रौशन सब संसार भा गया
फूलों की मालाएँ सज गयी
हो छोटी या खूब बड़ी

रंग बिरंगे दृश्य बने हैं
सज धजकर सब बने ठने हैं
माँ लक्ष्मी के साधक हैं सब
उमड़े मन में भाव घने हैं
नजर नहीं हटती पल भर भी
रह जाती है आँख गड़ी

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ अक्टूबर २०२२

       

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