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             दीप जगमग


दीप जगमग जगमगाते जा रहे हैं
हर जगह से तम मिटाते जा रहे हैं

मन लुभाती है सभी का दीपमाला
सब मज़े इसके उठाते जा रहे हैं

जिन्दगी के रंग में रस घुल रहा जब
पर्व ज्योतित सब मनाते जा रहे हैं

एक दूजे को नये उपहार देकर
नेह आपस में बढ़ाते जा रहे हैं

प्रीति लेकर दीप से अनगिन दियों को
रात में अविरल जलाते जा रहे हैं

चाहते हैं खूब धन वैभव सभी जन
भाव की सरिता बहाते जा रहे हैं

पर्व है यह विष्णु-पत्नी अर्चना का
निज घरों को सब सजाते जा रहे हैं

- सुरेन्द्रपाल वैद्य

१ नवंबर २०२३
   

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