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       एक दिया अपने नाम


मैंने बरसों बरस जलाये दिए
किया उजाला घर के
हर कोने अतरे में
बीनती रही
सबका का अँधेरा
नहीं देखा कभी
अपने भीतर भरते जा रहे
उस अँधेरे को
जिसने निगल लिया
मेरा पूरा वजूद
लील ली मेरी परछाई तक
अबकी बरस भी जलाऊँगी दिए
करुँगी रोशन
घर का हर कोना अतरा
पर साथ ही जलाऊंगी एक दिया
अपने लिए भी.
बुहारकर अपने भीतर का अंधेरा
भर लूँगी
इतनी रौशनी कि
दीख सके मुझे मेरा वजूद
इस दीवाली अप्पो दीप
हो जाना चाहती हूँ मैं

- उर्मिला शुक्ल

१ नवंबर २०२३
   

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