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          कातिक


चंदा सँग खेल रहे कातिक में तारे
परदेशी विहगों ने
साज हैं सँवारे

अलसी संग ज्वार सजी पहन उड़द गहने
सनई है डोल रही झुनझुनिया पहने
शकरकंद आलू सँग
अँगड़ाई मारे

स्वच्छ गेह दीप माल, अमा है लजाई
धरती में बीजों की हो रही बुवाई
धन कुबेर बसते हैं
गाँव में हमारे

सिंघाड़ों कुमुदों से ताल दिखें सजते
छिटक रही चंद्रप्रभा पाहुन खग हँसते
धवल गगन बाँट रहा
अमृत की फुहारें

- बृजनाथ श्रीवास्तव

१ नवंबर २०२३
   

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