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        दीप जलाओ
 
दीप जलाओ प्रेम जगाओ
मन से तम का भार हटाओ
नफरत की हर दीवार गिराकर
प्रीत का सुंदर दीप जलाओ

एक दिया उस द्वार जलाना
जहाँ उदासी डेरा डाले
एक दिया उस मन में रखना
जिसके सपने टूटे-काले
दुख के आँसू पोंछ किसी के
जीवन में मुस्कान सजाओ
दीप जलाओ प्रेम जगाओ
मन से तम का भार हटाओ

लक्ष्मी केवल धन में नहीं है
सच्चे मन के भावों में है
सेवा करुणा प्रेम-समर्पण
जीवन के सद्भावों में है
भूखे मुख पर हँसी खिलाकर
पर्व का सच्चा मान बढ़ाओ
दीप जलाओ प्रेम जगाओ
मन से तम का भार हटाओ

- अनीता मिश्रा सिद्धि
१ नवंबर २०२६

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