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        नन्हा-सा प्यारा बचपन
 
दीप-दीवाली  खील-बतासे
क्या जाने लक्ष्मी पूजन
बिन फुलझड़ी के रूठ गया
नन्हा-सा प्यारा बचपन

बीच द्वार के आ बैठा है
मार रहा सर चौखट पे
कौन सुने जब दीप नहीं है
बिन बाती भी दीवट पे
कोई कंघी तेल नहीं है
क्या जाने टिकसा उबटन

पहर-पहर पर फेरा करता
साहूकार पुराना है
बात-बात पे घुड़की देता
देता रहता ताना है
श्वासे गिरवी रखने वाला
जाने सच सारा रहज़न

बिखरे केश फटी सी धोती
कुर्ता पहन फटा मैला
बापू लौटा हाथ लिए है
पिचका-सा खाकी थैला
हाथ निराशा फिर आयी है
खूब हुई मन से अनबन

- अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
१ नवंबर २०२६

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