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        एक दीप बालें
 
सूने से द्वार पर
एक दीप बालें

नाचते उजाले के मोर
हुआ बम-पटाखे का शोर
राम-राम रटेगा
मिट्ठू को पालें

दिवाली सखी है मही की
पूजा है खाता-बही की
अवांछनीय बातें
जितना हो टालें

रात में दिया है जूझता
तम से कुछ सवाल बूझता
नाज़ुक सी हालत है
खुद को सम्हालें

- अविनाश ब्यौहार
१ नवंबर २०२६

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