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        तुम दीपक
 
तुम दीपक में स्नेह हो, तुम बाती में जागर
तुम सागर में बूँद हो
तुम्हीं बूँद में सागर

यह दीपक जलता रहे जीवन हो उजियार
अंधड़ छू न सके इसे रक्षक हो करतार
तुम आले की जोत हो
ज्योतित तुममें आगर

नवल प्रभाओं को मिले नित-नूतन विस्तार
अपना आपा साथ हो जुट जाए संसार
फूल झरें अमरित गिरे
सुख समरिध हो गागर

- पूर्णिमा वर्मन
१ नवंबर २०२६

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