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        अंधियारे आँगन में
 
एक दीप रख दे हम
अंधियारे आँगन में

जहाँ उजाले रूठ गए हैं
सुख पीछे को छूट गए हैं
किस्मत से लड़ते-लड़ते जो
भीतर तक से टूट गए हैं
आओ आस जगाएं
बुझे बुझे जीवन में

जगमग दीवाली हो सबकी
चमक न फीकी हो उत्सव की
कोई भी मायूस ना हो फिर
उजली रातें हो मावस की
मुक्तहस्त से बाँटे
अपनापन जन-जन में

- रघुवीर शर्मा
१ नवंबर २०२६

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