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        दीप का निश्चय
 
चक्रवातों
से लडेगा फिर समर में
एक नन्हें दीप ने निश्चय किया

पूर्णिमा की रात हो या हो अमावस
ज्योत्स्ना ने अमर की जो पर्व तिथियाँ
जो कथा बाँची गई देवालयो में
आज भी उपलब्ध हैं वे पाण्डुलिपियाँ

ज्योतिधर्मा
दीप की निष्ठा अलौकिक
देख सूरज ने बड़ा विस्मय किया

तिमिरवंशी दिग्विजय के अश्व रोके
क्षण रचे आलोक उत्सव के यहाँ
राजसी अट्टालिकाओं में जला तो
दीन की देहरी कलुष छोड़ी कहाँ

शीश धर
ज्योतिर्गमय अनुबंध सारे
दुस्साहसी तमस से परिचय किया

धूल-माटी से बना अस्तित्व लघुतम
तेल- बाती ने इसे जीवन दिया
बाँटता है दीप्ति दिनकर दिन हुआ
किन्तु इसने रात को उज्ज्वल किया

विपथगामी
हो न जाए सान्ध्यवेला
कालिमा से दीप ने परिणय किया

- रमेश गौतम 
१ नवंबर २०२६

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