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        दीप जलता रहे
 
दीप जलता ही रहे
अनुराग का, नवज्ञान का

शुद्ध सब का इस धरा पर आचरण हो
मन विचारों का सुगन्धित व्याकरण हो
बीज पलता ही रहे
विश्वास का, विज्ञान का

सत्य की लौ हर तरफ जलती रहे
द्वेष-ईर्ष्या हाथ को मलती रहे
गीत बजता ही रहे
समभाव का, सम्मान का

तम उजाले से डरे भागा रहे
मनुज आलस नींद से जागा रहे
दीप बुझता ही रहे
अभिमान का, अज्ञान का

- डा रामेश्वर प्रसाद सारस्वत
१ नवंबर २०२६

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