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        दीप मैंने रखे
 
प्रीति के द्वार पर दीप मैंने रखे,
साधना के लिए, अर्चना के लिए

मन के मंदिर में मूरत रखी है यहाँ
अपलक मन की दृष्टि टंगी है जहाँ
नाम जपता रहा प्रीति में हर घड़ी -
नेह गीतों की सरगम सखी है वहाँ

प्रीति की रीति में गीत गाते हुए -
मैं जलाता रहा प्रार्थना के दिए

एक पुल बन गया मौन संवाद का
भाव को शब्द देता है अनुवाद का
प्राण मेरे महाकाव्य में आ बसो -
गीत-गोविन्द बनकर मधुर याद का

नित्य धरता रहा प्रीति के द्वार पर-
नेह की पंक्तियां वंदना के लिए

बंद आंखों से जब-जब निहारा प्रिये
बन गई मन के नभ का सितारा प्रिये
देह दो एक प्राण हो गई आत्मा -
प्रीति के गीत का हो सहारा प्रिये

मेरे गीतों में दीपित है झिलमिल यहाँ -
आस्था के दिए, सर्जना के लिए

- सुरेन्द्र कुमार शर्मा
१ नवंबर २०२६

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