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        जल जाते दीप
 
दूर हुआ करता अंधियारा
जगमग जब जल
जाते दीप

मिट्टी की है सुन्दर काया
जिसे देख हर मन हर्षाया
जग जाती हैं नयी उमंगें
पुष्प खिले ज्यों रंग बिरंगे
इसीलिए हर नगर ग्राम में
जन-मन को हैं
भाते दीप

भाँति-भाँति के रूप मनोहर
आते इनमें निखर निखर कर
किन्तु सभी का एक काम है
रौशन करते धरा धाम है
पर्व कहीं पर कोई भी हो
शोभा खूब
बढ़ाते दीप

दीपक का मिट्टी से नाता
आगे ही बढ़ता है जाता
गहन बहुत है सबके मन में
इसकी महिमा जन-जीवन में
परंपरा के वाहक हैं ये
राह नयी
दिखलाते दीप

भेदभाव ये नहीं जानते
सबको एक समान मानते
दर्शन है इनका समरसता
जिससे मिट जाती हर कटुता
हर हालत में होते ज्योतित
तम की निशा
मिटाते दीप

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ नवंबर २०२६

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