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हम भी रखते दीपक |
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हम भी रखते दीपक कोई
प्यार से तेरे आँगन में
कोई हमको
बता रहा था, हम वंचित हैं अब
सुविधा से
कोई पूछ परख न अपनी बँधे हुए
हैं बस दुविधा से
कोई पास नहीं आता है बुरे
स्वभाव के
प्रांगण में
इस दीवाली
जिद छोड़ के बैठे, परंपरा कुछ
तोड़ के बैठे
हम कुंठाओं के जंगल में वही
रिदा फिर ओढ़ के बैठे
जिसमे राज किया करते थे, लोक
रहा
करते थे भ्रम मे
मेरे पास
धमाके अब भी यदि फोड़ूँ तो
पटाके अब भी
गिनती के अनार हैं बाकी बाँछे
खिल जाएँगी सबकी
यदि चल जाए मेरा राकेट मचे
खलबली संतन में
हर साल
दीवाली आती है ये मेल मिलाप
बढ़ाती है
अबकी जब यह पाँव धरे मन दीपक
से शृंगार करे
मर्म आदमीयत का समझो क्या
रक्खा
बाकी जीवन में
- सुशील यादव
१ नवंबर २०२६ |
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