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        नेह-दीपक
 
रोशनी बिखरे सकल संसार पर,
जलता रहे नेह-दीपक
द्वार पर

चाक पर घूमी कुम्हारी कल्पना
आँच पर सुलगी समूची वेदना
सूत की बाती भिगोई भाव से
और जलना रात दिन है साधना
गर्व से माटी चढ़ी
शृंगार पर

काठ की दीवट गगन को ताकती
साँझ-देहरी पर उजाला आँकती
थरथराते झोंक लेता दीप यह
हर किरन नव भोर भीतर झाँकती
जल उठे यह दीप फिर
से हार पर

सुलगती यह लौ तिमिर से लड़ रही
संघर्ष की हर रात सीढ़ी चढ़ रही
स्वयं को तिल-तिल जलाकर नेह से
आस की पाती तिमिर में पढ़ रही
जीत की रेखा खिंची
अँधियार पर

- सुशील शर्मा
१ नवंबर २०२६

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