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        ज्योति का उमड़ा समुंदर
 
आज चहुंदिश ज्योति का उमड़ा समुंदर
चलो हम भी भरें द्युति के रूप अंदर!

दूर भागे अब कठिन नैराश्य का गहरा अंधेरा
उदित हो जाए नये संकल्प का नूतन सबेरा
आज धरती बरस जाए, नहा जाए
नील अंबर !

आज डब-डब स्नेह से भर जाए तो हर दीप का मन
निखर आए मिट्टियों से शुभ्रतम वह रूप का क्षण
झरें खिलकर फुलझरी से रश्मि के वे
फूल झर- झर!

रोशनी के आगमन की हो चहुंदिश अब मुनादी
जले दीपक ने जगा कर जागरण की धुन सुना दी
लग रहा पूरे जगत में हिंद कितना
आज सुंदर!

आज हर नर गण पति है और नारी सिंधुजा है
सुवासित घर-द्वार, आंगन फहरती जाती ध्वजा है!
देखकर अब ललकते हैं स्वर्ग - राजा
आज इन्दर!

- उदयशंकर सिंह 'उदय'
१ नवंबर २०२६

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