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जगमगाएँ दिये |
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दीप जलता रहे तम पिघलता रहे
ज्योति का हो सभी ओर यों
अवतरण
दूर छंटता रहे धुंध का आवरण
जगमगायें दिये एक आस्था लिये
डूब जायें तिमिर के घने
हाशिये
चीर दे हर तमस्तोम
ज्योतिर्किरण
प्यार मन में जगे द्वेष मन का
भगे
दृष्टि जो भी उठे स्नेह की ही
लगे
स्वर्ण-पथ की तरफ ही
बढ़े हर चरण
भावना हो सदा बांट लें आपदा
भूल जायें सभी भाग्य में क्या
बदा
एक ही ध्येय का सब
करें अनुसरण
हो यही एषणा बस मिले प्रेरणा
हो न अवसाद कोई न हो यंत्रणा
स्वस्थ मन हो, तथा
शुद्ध अंत:करण
हो न कोई क्षरण कुछ न हो
विस्मरण
हों सुभाषित नये उक्तियां,
उद्धरण
सिर्फ निग्रह नहीं
साथ हो संग्रहण
गीत जो भी पले प्यार में ही
ढले
वंचना, छद्म कोई न मन को छले
प्रेम के पेय से हो
सभी का भरण
हो न अतिरेक असहज न अतिशय दमन
तर्कसंगत रहे हर सही संतुलन
संकुचन हो न कोई
न हो विस्तरण
हार जाये घृणा वैर का संक्रमण
सौम्य, निश्छल नदी में
करें संतरण
- योगेन्द्र दत्त शर्मा
१ नवंबर २०२६ |
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