अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर


मेघ महल वर्षा भरे
 

 

मेघ महल वर्षा भरे, उतरे धरती ओर।
घर आँगन महकें सभी, बूँदें करतीं शोर।

रिमझिम बूँदें झर रहीं, बजते सुन्दर साज।
घन-मृदंग संगत करे, टिप-टिप मृदु आवाज़।

शुष्क धरा को देख के, घन-घट छिड़कें नेह।
शस्य-श्यामला हो मही, अन्न भरे हों गेह।

सूरज गर्मी से तपे, वाष्प धरा दे भेज।
वह घट-मोती भेंट दे, आँचल भरा सहेज।

रिश्ता माटी से जुड़े, सोंधी महक बहाय।
सृष्टि हरित लहरा उठे, जब वर्षा ऋतु आय।

- ज्योतिर्मयी पंत
२८ जुलाई २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter