अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


         भीगे भाव प्रपात में

 
 
हँसे खेत खलिहान सब,इस मौसम बरसात में
पाकर प्रेम फुहार को, भीगे भाव प्रपात में।

चूल्हा सीला देखता, कब उसमें भी आग हो
जब निर्धन की झोपड़ी, टप-टप टपके रात में।

बसी गृहस्थी कोसती, ऋतु भर की अति वृष्टि को
मनुज कमाई डूबती, मौसम के आघात में।
सुन ध्वनि दादुर मोर की, धँसी सड़क यह सोचती।
दुर्घटना कब तक बचे, सुख दुख के आयात में।

नित पानी में तैरता, दावा क्षेत्र विकास का
बंद पड़ी हैं नालियाँ, सरकारी उत्पात में।

वृक्षारोपण अब करें, रोकें नद्य जमाव को
पूरी हो परियोजना, देरी क्यों हो बात में।

क्लांत नीतियाँ हो व्यथित, समाधान को ढूँढ़तीं
पावस कब लेकर चले, जीवन सुखद प्रभात में।

-अनिता सुधीर आख्या
१ अगस्त २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter