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         अब जा कर टूटी है वर्षा

 
 
अब जा कर टूटी है वर्षा
वर्ना तो अटल पर्वत बन कर
पूरे चौमासे भर टिकी रही है
सृष्टि के सामने
कितने ग्लेशियर धराशायी हुए
कितने मकान तैरते हुए चले गए
मीलों दूर
फिर भी वर्षा टूटी नहीं
चिंघाड़ती रही किसी खूंखार
बाघिन की तरह

डकराती रही अपने रौद्र रूप में
पर भादों के जाते जाते शायद
टूट गयी है वर्षा
स्वागत में एक नयी ऋतु के
शिशिर ऋतु के
नई कोंपलें फूटेंगीं
नया कलरव होगा
नया-नया-सा आसमान होगा
नयी-नयी-सी धरा होगी
क्यों कि
अब जा कर टूटी है वर्षा

- आभा सक्सेना 'दूनवी'
१ सितंबर २०२५

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