अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


         बरखा मलती मरहम

 
 
धूप-दंश सहती शाखों पर
बरखा मरहम मलती है
मंत्र फूँकने हरियाली का
झर-झर मेहा
झरती है

धूल बुहार रही गलियों की
तेज़ हवाएँ बंजारिन
उड़े महक सोंधी-सोंधी जब
बरसें बूँदें पनिहारिन
वन-उपवन लहलहा उठे यूँ
नभ से प्रीत
बरसती है

उमड़ घुमड़ घनघोर घटाएँ
लायीं न्यौता सावन का
बाँट रहा अम्बर सौगातें
फूटा अंकुर जीवन का
ओढ़ चुनरिया धानी, धरती
पुलकित मन ले
फिरती है

अंतस ले यादों की बदरी
रुत सावन की आयी है
मेहँदी, चूड़ी, झूला, मेला
बिटिया खुशियाँ लायी है
झूम रही है सँग बरखा के
त्योहारों की
मस्ती है

- आभा खरे
१ अगस्त २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter