अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


         बादल बरसे हैं

 
 
तुमको लगता है केवल बादल बरसे हैं
मुझे पता है किन प्रश्नों के
हल बरसे हैं

ज्यों प्यासे के पास कुआँ चलकर आया है
जैसे कोई स्नेह-छत्र बनकर छाया है
तपते मन पर ज्यों
ख़ुशियों के पल बरसे हैं

लाये हैं ऊसर की ख़ातिर धानी चूनर
जागा है चातक कंठों में फिर से नव स्वर
दुबलायी नदियों के
ज्यों संबल बरसे हैं

बरसे हैं, सुनकर स्वागत को कजरी आयी
फूल हँसे हाथों में मेहँदी भी मुस्कायी
इंतज़ार के हिस्से
मीठे फल बरसे हैं

- गरिमा सक्सेना
१ अगस्त २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter