अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


        मत सोचो

 
 
मत सोचो
मत सोचो बादल आयेंगे

आसमान तक पहुँच चुका है
धरती का कोहराम
सागर के खारेपन ने
है जीवन किया हराम
जैसे-तैसे आज बिताकर
कल सब दुखड़ा ही पायेंगे
मत सोचो बादल आयेंगे

तोते पिंजड़े छोड़ उड़ेंगे
घर में होंगे बाज
हंस कैद में बँध तड़पेंगे
बगुले भोगें राज
कोयल के स्वर कुंठित होंगे
काग सुहानी धुन गायेंगे
मत सोचो बादल आयेंगे

छाँव-गाँव की धूप वरेगी
सूखेंगे वट- नीम
सड़कें पहुँचेंगी जंगल तक
होंगे गिद्ध यतीम
वसुधा के गर्वीले सपने
छितरा कर मुँह की खायेंगे
मत सोचो बादल आयेंगे

- कल्पना मनोरमा
१ अगस्त २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter