अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


         मेघा आए हैं

 
 
तेरी खुशबू, तेरी चाहत, भर-भर लाए हैं
आज गाँव में मेरे घिर-घिर मेघा आए हैं

हार-थके थे नयन बावरे, बेसुध बंजारे
पाहुन बनकर लौट गए
खुशियों के हरकारे
नयनों में घिर स्वर्णिम स्वप्न सुहाने आए हैं
आज गाँव में मेरे घिर-घिर मेघा आए हैं

रह-रह कर पुरवैया छेड़े, आँचल सरकाए
सरस-परस पावस का
तन-मन में सिहरन लाए
साँसों की सरगम ने खुश हो मंगल गाए हैं
आज गाँव में मेरे घिर-घिर मेघा आए हैं

कोई क्या जाने तेरे बिन, दिन कैसे बीते
घर-अँगने सूने-सूने,
पल-छिन रीते-रीते
स्मृतियों ने राम कसम कितना झुलसाए हैं
आज गाँव में मेरे घिर-घिर मेघा आए हैं

- डा रामेश्वर प्रसाद सारस्वत
१ अगस्त २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter