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         एक उदासी तोडें

 
 
पनियारा हो दिन इतराया
कपसीला बादल करियाया
जाते जाते सूरज फिसला
मन ही मन फिर बतियाया
गीली बहती हुई हवा में
कुछ मंसूबे छोड़ें
एक उदासी तोड़ें

चौमासे की एक कड़ी है
कई दिनों से लगी झड़ी है
किरणों की आहट से निकली
थोड़ी सी ही धूप खड़ी है
आँगन की रस्सी पर लटके
कपड़े जरा निचोड़ें
एक उदासी तोड़ें

घर में अक्सर मेघ छकाते
गिरते थमते खूब सताते
कभी हँसाते कभी रुलाते
इधर बुलाते उधर भगाते
देखें इनकी धमा चौकड़ी
मन के गुब्बारे फोड़ें
एक उदासी तोड़ें

सड़कों पर कीचड़ की थाली
उछल उछल देती है गाली
आते जाते हुए वाहनों
से सुन लो छींटों की ताली
रेनकोट छतरी से आओ
कुछ तो नाता जोड़ें
एक उदासी तोड़ें

- आचार्य श्रीधर शील
१ अगस्त २०२५

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