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         आई है बरसात

 
 
झूमे तन
गाये मन
लहराये जल वात
तपती दुपहर एक तरफ कर आई है बरसात!
ओ रामा होऽऽ!
ओ रामा होऽऽ!

आसमान के तन पर लिपटी
चितकबरी मृगछाला
राग मल्हार उठाये घूमे
धरती की मधुबाला

चंदा रूठा
दरपन टूटा
कौन हुआ है साथ!
बिना विदा ही लौट गयी लो तारों की बारात!!
ओ रामा होऽऽ!
ओ रामा होऽऽ!

हरी पहाड़ी घिरी हुई है
बादल से कुछ ऐसे
चूनर ओढ़े खिली अबोली
बाँहों में हो जैसे

दर दर घूमे
कभी न चूमे
किस्मत ने ये हाथ
फिर भी प्यार बाँटता फिरता बनजारा दिन रात!

ओ रामा होऽऽ!
ओ रामा होऽऽ!

- सुभाष वसिष्ठ
१ अगस्त २०२५

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