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वर्षा महोत्सव

वर्षा मंगल
संकलन

पावस गीत




दूर देश के अतिथि व्योम में
छाए घन काले सजनी,
अंग-अंग पुलकित वसुधा के
शीतल, हरियाले सजनी!

भींग रहीं अलकें संध्या की,
रिमझिम बरस रही जलधर,
फूट रहे बुलबुले याकि
मेरे दिल के छाले सजनी!

किसका मातम? कौन बिखेरे
बाल आज नभ पर आई?
रोई यों जी खोल, चले बह
आँसू के नाले सजनी!

आई याद आज अलका की,
किंतु, पंथ का ज्ञान नहीं,
विस्मृत पथ पर चले मेघ
दामिनी-दीप बाले सजनी!

चिर-नवीन कवि-स्वप्न, यक्ष के
अब भी दीन, सजल लोचन,
उत्कंठित विरहिणी खड़ी
अब भी झूला डाले सजनी!

बुझती नहीं जलन अंतर की,
बरसें दृग, बरसें जलधर,
मैंने भी क्या हाय, हृदय में
अंगारे पाले सजनी!

धुलकर हँसा विश्व का तृण-तृण,
मेरी ही चिंता न धुली,
पल-भर को भी हाय, व्यथाएँ
टलीं नहीं टाले सजनी!

किंतु, आज क्षिति का मंगल-क्षण,
यह मेरा क्रंदन कैसा?
गीत-मग्न घन-गगन, आज
तू भी मल्हार गा ले सजनी!

- रामधारी सिंह दिनकर
3 सितंबर 2001

  

एक कहानी है बादल

मैं सैलानी- तुम सैलानी
गति दोनों की ही मनमानी।
पलती है भीतर दोनों के -
एक कुँआरी पीर अजानी।

दोनों में हैं घुटन भरी -
दोनों में पानी है
बादल! मेरी और तुम्हारी
एक कहानी है।

अनगिन रूप-धरे जीने को
लिए-लिए छलनी सीने को
कहाँ-कहाँ भटके हैं हम-तुम
लेकर अपना यौवन गुमसुम।

फिर गाँव, बस्ती में बन में
कुछ न कहीं पाया जीवन में
फिर भी हँसते रहे सदा-
कैसी नादानी है।

हमने जितने स्वप्न सँवारे
मौसम पर बंधक हैं सारे
कितने ही दिन हम ऋतुओं के
आगे रोए - हाथ पसारे।

कहकर सबसे दुआ बंदगी
धुआँ-धुआँ हो गई ज़िंदगी
हम पर बची नहीं
कोई भी नेह निशानी है।

-कन्हैयालाल बाजपेयी
21 अगस्त 2005

छम-छम बूँदे

छम-छम बूँदे बरखा की
लेकर आई है संगीत नया
हरियाली और प्रेम का
बना हो जैसे गीत नया
मनभावन-सा लगे हैं सावन
हर चितवन हो गई है पावन
मेघों ने मानों झूमकर
धरती की प्यास बुझाई है
खेलकर खेतों में
फैलकर रेतों में
मतवाली बरखा आई है
संग अपने
त्यौहारों की भी
खुशहाली वो लाई है

-स्मिता प्रसाद दारशेतकर
21 अगस्त 2005