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वर्षा महोत्सव

वर्षा मंगल
संकलन

आई बरखा बहार




सूखे पोखर, सूखी धरती,
जेठ की झुलसी बयार,
लागे ना जियरा हमार,
आई बरखा बहार,
ना आए सजनवा हमार।

बरखा की लेकर बारात,
डोली उठाए मेघा कहार,
बदरा गरजे बिजुरी चमके,
रिमझिम-रिमझिम फुहार,
दादुर लगाए गुहार।

विदाई की आई घड़ी
बौछारें दुआरे खड़ीं
कोछे देकर चाउर चबेना
फूलों सी बरसे लड़ी
सजना जिया डोले बार-बार।

सावन आया तुम ना आए
सखियाँ झूलें ले ले हिंडोले
आसमाँ तक पैंगा लगावें
कोयल पपीहा तंजि-तंजि बोलें
सखियाँ कोसें बार-बार।

मेरे रंग रसिया
लौट आ परदेसिया
गाँव टोला समझि रहे
रउरे के महरिया
कबतक करूँ इंतज़ार।

आयी बरखा बहार,
ना आये सजनवा हमार।

- शरद आलोक

5 सितंबर 2001

  

सावन

सावन लगा हुई हरियाली
कू-कू कोयल करती डाली
पड़ी फुहार मंद मुस्कानी
सब खेतों में भर गया पानी

मुड़ तालाबों की धुन देखो
मेंढ़क कहते मेघों बरसो
ऐसी घटा अँधेरी छाई
मंद-मंद चलती पुरवाई

डाल-डाल पर पड़ गए झूले
अब कुम-कुम के मन है फूले
सावन मास सुहावन लागे
घर से योगिन बाहर भागे

ये सुंदर वर्षा ऋतु आई
प्यासी धरती की प्यास बुझाई
जंगल में कैसा है शोर
मस्त मगन हो नाचे मोर

सब बच्चों के मन को छू लें
आओ सखियों झूला झूलें
चिड़िया चीं-चीं करती डाली
सावन लगा हुई हरियाली।

- शंभुनाथ

20 अगस्त 2005

प्यासा मरुधर

बादल चलो रुकना अब मरुधर पर
यह अमृत देना उसको
जो राह तुम्हारी तकता है
बस प्यास बुझाने की चाहत में
रोज स्वयं ही
एक मिरीचिका संजोता है
प्यासा कोइ मरुधर की इस तृष्णा को
खुद की तृप्ति समझता है
बादल बरसो अब तो तुम
हर कण-कण को प्यास बुझाने दो
जो ख्वाब संजोता है मरुधर रोज़
वो मिरीचिका
आज सत्य हो जाने दो़।

-प्रमोद पांडे

27 अगस्त 2005

 

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