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वर्षा महोत्सव

वर्षा मंगल
 संकलन

बादल का पानी

बरस गया बादल का पानी!

बिजली चमकी दूर गगन में,
कंपन होते प्राण भवन में,
तरल-तरल कर गई हृदय को,
निष्ठुर मौसम की मनमानी।
बरस गया बादल का पानी!

धुली आस कोमल अंतर की,
बही संपदा जीवन भर की,
फिर भी लेती रहीं लहरियाँ
हमसे निधियों की कुरबानी।
बरस गया बादल का पानी!

धार-धार में तेज़ लहर है,
लहरों में भी तेज़ भँवर है,
सपनों का हो गया विसर्जन,
घेरे आशंका अनजानी।
बरस गया बादल का पानी!

-डा अजय पाठक
28 अगस्त 2005

  

चैत्र में वर्षा की एक रात

रात बारह बारह बजे
आँधी के साथ उड़ने लगी
घर की खपरैल
पानी के साथ गिरते ओलों से
घबरा गई माँ
और बढ़ गई पिता की चिंता

माँ टपकती छत के नीचे से
सामान हटाती हुई
कोसने लगी इंद्र को

पिता खटिया पर बिछी
कथरी उठा जा बैठे पौर में
और उखड़ती हुई साँस से
चिल्ला रहे थे
"गेहूँ भीतर धरो
कपड़ा लत्ता उठा लो
चखिया पे फट्टा डार दो"

असमय बरसात से
बैठ गया माँ बाप का कलेजा
और मैंने डबडबाई आँखों से
पूरे घर को हिलते हुए देखा

- हरगोविन्द पुरी
7 सितंबर 2001

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