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vaYaa- maMgala
saMklana

आए घन पावस के

 

अलि घिर आए घन पावस के

लख ये काले-काले बादल
नील सिंधु में खिले कमल दल
हरित ज्योति चपला अति चंचल
सौरभ के रस के

द्रुम समीर कंपित थर-थर-थर
झरती धाराएँ झर-झर-झर
जगती के प्राणों में स्मर शर
बेध गए कस के

हरियाली ने अलि हर ली श्री
अखिल विश्व के नवयौवन की
मंद गंध कुसुमों में लिख दी
लिपि जय की हंस के

छोड़ गए गृह जब से प्रियतम
बीते कितने दृश्य मनोरम
क्या मैं ऐसी ही हूँ अक्षम
जो न रहे बस के

-सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

12 सितंबर 2005

  

पहली बारिश

मौसम की वो पहली बारिश
मिट्टी की वो सौंधी खुशबू
सावन का वो पहला बादल
उस पर घनघोर घटा हर सूँ।

बिजली का गर्जन, बादल का कंपन
अंतस में सिहरता सिमटता मन
पपीहे की पिहू मयूर का नर्तन
कुलाँचे भरता मन का हिरन।

अँधेरे में जुगनू की टिमटिम
हल्की-हल्की बूँदों की रिमझिम
पात-पात पर डोलती हवा
सरसर के गीत घोलती हवा

आँख मिचौली करता चाँद
हँसी ठिठोली करता चाँद
बादल का घूँघट ओढ़े
छुपता और निकलता चाँद।

भीनी-भीनी चंपा की महक
झीनी-झीनी रजनी की लहक
सुनकर बादलों का हर्ष नाद
मन में छाया जाए उन्माद

-समता आर्या
12 सितंबर 2005

 
 

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