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        दूर बहुत अब नहीं विजय है

 
कह गयी है कान में
चुपचाप ये मुझसे हवा
दूर बहुत अब नहीं विजय है

धार पैनी थी समय की ज़ख़्म तो लगने ही थे
थे अँधेरों के रवाँ हर तीर भी सहने ही थे
पर न हारेंगे कभी
मन के उजालों ने कहा
चमक सूर्य सी रही विजय है

खौफ़ लहरें जब दिखाएँ हो हवा भी बेरहम
कश्तियाँ गर ना सही पतवार तो भरती है दम
बीच धारा से गुज़र
फिर पार होती इक दुआ
चूम तटों को रही विजय है

आँधियाँ पुरजोर करतीं कोशिशें अपनी मगर
ज़िद चरागों की गज़ब लड़ते रहे, हारे न पर
हट गयीं पीछे हवाएँ
लौ लगी देने सदा
जोश संग जल रही विजय है

काट दें हम बेड़ियाँ गर हौसलों तुम साथ हो
तोड़ के सब रूढ़ियाँ हम रच सकें इतिहास वो
ज़िद यहीं अब ठान ली है
कह सकेंगे हम यहाँ
हाँ अपनी तो यही विजय है

- आभा खरे
१ अक्टूबर २०२१

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