अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        मन आशा से दमक रहा

 
सजा रही अलबेला सपना
मन आशा से दमक रहा

राह बहुत हमने थी देखी आन विराजो रघुनन्दन
फूल चमेली बेला भाये लाये अगरु धूप चन्दन
मंगल बेला अब है आई
खुश हो घर गमक रहा है

रात अमावस की काली थी, निशि शशि ने आस सजाई
राह प्रकाशित करनी चाही चूनर तारों भर लाई
सुमन मेघ बरसाने आये
बन साक्षी अब फलक रहा

कन्धे पर हैं धनुष सजाये ओढ़ रखा है पीताम्बर
सुन्दर छवि है जग भरमाये नाच रहे धरती अम्बर
आज महोत्सव अवध मनाये
दीवाली सा चमक रहा !

- निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'
१ अक्टूबर २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter