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१३. २. २०१२

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जाड़े की है धूप उदासी

सूरज फिर
से हुआ लाल है

जाड़े की है धूप उदासी
कुछ गुमसुम कुछ पीली पीली
जैसे रेत समेटे मुट्ठी
बँधी हुई हो
ढीली ढीली

फुरसत के
पल की कुछ यादें
दिखलाती हैं दृश्य पुराने
जब आते थे हँस लेने के
मन तो ढेरों ढेर बहाने
प्रेम डोर से बँधी हुई थी
वह पोथी कुछ
सीली सीली

यूँ तो शीत
जकड़ कर बैठी
कंबल चादर मोटे स्वेटर
गूँज  रहे  हैं  कानों  में
गरमाहट के रीते आखर
फिर भी तनमन सुलग रही है
पोर पोर पर
तीली तीली

जल्दी
उगते जल्दी ढलते
दिन के जैसा साथ हमारा
मन को अब तक साल रहा है
इक अनुभव कुछ खारा-खारा
अपने दुखड़ा बाँच रही हैं
मेरी आँखें
गीली गीली

-शरद सिंह

इस सप्ताह

गीतों में-

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डॉ. सुश्री शरद सिंह

अंजुमन में-

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गिरिराजशरण अग्रवाल

छंदमुक्त में-

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विजया सती

कवित्त में-

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राजेन्द्र स्वर्णकार

पुनर्पाठ में-

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पं. रामेन्द्र मोहन त्रिपाठी

पिछले सप्ताह
६ फरवरी २०१२ के अंक में

गीतों में-

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देवेन्द्र कुमार

अंजुमन में-

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रोहित कुमार 'हैप्पी'

छंदमुक्त में-

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विनीता जोशी

ताँका में-

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डॉ. जगदीश व्योम

पुनर्पाठ में-

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शरद महोत्सव हाइकु में

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

सहयोग : दीपिका जोशी

 
 
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