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  ७. ५. २०१२

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मन माँझी बन कर गाता है

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मन माँझी
बन कर गाता है
सुख दुःख के सागर में अविरल
जीवन नौका तैराता है

मेरे जीवन
की यह नौका
बिन बाधा के बढ़ती जाए
लहरों के
शांत थपेड़े हों,
मंथर गति से चलती जाए

मेरे अनुकूल समीरण हो,
तन्मय सुर में दोहराता है

चंदा को
गाता गीतों में,
सूरज की किरणों को गाए
नभ में
छाए काले बादल,
वारिद की बूँदों को गाए

ले पुनर्मिलन के गीत सजे
कभी विरहा राग सजाता है

है मंजिल
मेरी दूर अभी
मेरा अदृश्य किनारा है
कुछ और
नहीं है पास मेरे
बस आशा एक सहारा है

मैं अपने प्रिय से दूर अभी
उसका सन्देश बुलाता है

-विजयकुमार सिंह

इस सप्ताह

गीतों में-

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विजय कुमार सिंह

अंजुमन में-

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लोकेश नशीने 'नदीश'

छंदमुक्त में-

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वर्तिका नंदा

मुक्तक में-

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डॉ. मीना अग्रवाल

पुनर्पाठ में-

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अनूप सेठी

पिछले सप्ताह
३० अप्रैल २०१२ के अंक में

गीतों में-

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धनंजय सिंह

अंजुमन में-

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मनोहर विजय

दिशांतर में-

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हांगकांग से प्रवीण अग्रवाल

हाइकु में-

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अनीता कपूर

पुनर्पाठ में-

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डॉ. भूपेन्द्र दवे

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

सहयोग : दीपिका जोशी

 
   
 
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