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अभिव्यक्ति तुक-कोश

३. ३. २०१४

अंजुमन । उपहार । काव्य संगम । गीत । गौरव ग्राम । गौरवग्रंथ । दोहे । पुराने अंक । संकलन । अभिव्यक्ति
कुण्डलिया । हाइकु । अभिव्यक्ति । हास्य व्यंग्य । क्षणिकाएँ । दिशांतर । नवगीत की पाठशाला

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कैसे बीते काले दिन
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 ११११११११११ ज़रा पूछिए इन लोगों से,
कैसे बीते काले दिन।
फुटपाथों की सर्द सेज पर,
क्रूर कुहासे वाले दिन।

दिनकर, जो इनका हमजोली,
वो भी करता रहा ठिठोली।
तहखाने में भेज रश्मियाँ,
ले आता कुहरा भर, झोली।

गर्म वस्त्र तो मौज मनाते,
इन्हें सौंपते छाले दिन।

दूर जली जब आग देखते,
नज़रों से ही ताप सेंकते
बैरन रात न काटे कटती,
गात हवा के तीर छेदते।

इन अधनंगों ने गठरी बन,
घुटनों बीच सँभाले दिन।

धरा धुरी पर चलती रहती,
धूप उतरती चढ़ती रहती।
हर मौसम के परिवर्तन पर,
कुदरत इनको छलती रहती।

ख्वाबों में नवनीत इन्होंने,
देख, छाछ पर पाले दिन।

- कल्पना रामानी

इस सप्ताह

गीतों में-

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कल्पना रामानी

अंजुमन में-

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नवीन चतुर्वेदी

छंदमुक्त में-

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केशव शरण

कुंडलिया में-

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महावीर उत्तरांचली

पुनर्पाठ में

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अभिनव कुमार सौरभ

पिछले सप्ताह
२४ फरवरी २०१३ के अंक में
 

अंजुमन में-

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शरद तैलंग

छंदमुक्त में-

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पूनम शुक्ला

गीतों में-

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योगेन्द्र वर्मा व्योम

हाइकु में-

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सावित्री डागा

पुनर्पाठ में-

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अभय कुमार यादव

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

सहयोग :
कल्पना रामानी
   
 

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