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बृजदेव पांडेय

 

फिर भी तुम

मैने अपने बंगले के सामने लॉन में
शहीदों की मूर्तियाँ लगवा दी हैं
और आधुनिकता भोगते कमरे में
गांधी के विचारों को ढोने वाली पुस्तकें
शीशे की चमकदार अलमारी में
सजा दी हैं
फिर भी तुम
चीन में चावल
और पाकिस्तान में महज़ एक कागज़
भेजने के कारण
मुझे देशद्रोही कहते हो?
बोलो तुम्हारी जुबान पर
मेरा वज़न बढ़ जाय
तुम्हारी संस्था को कितना चंदा दे दूँ
कहो तो तुम्हारे नाम से प्रकाशन कर दूँ
तुम में मैं जिऊँ।
यह भी मेरा सौजन्य है
कि तुमसे कुछ मीठी बातें कर रहा हूँ
न्याय के धार मुड़े शस्त्र से क्यों डरते हो?
सुनो
न्याय के कंधे
योजना की फाइलों की तरह
भारों से दबे हैं
और हमारे सभी स्मृतिकार
मर चुके हैं।

 

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