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दीप्ति नवल

फिल्म अभिनेत्री के रूप में जानी जाने वाली दीप्ति नवल बहुआयामी व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं। वे कवियित्री हैं, कलाकार हैं और कुशल फोटोग्राफर भी हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत से लगाव है और वे कई वाद्ययंत्र बजाती हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में कविता संग्रह 'लम्हा लम्हा' काफी लोकप्रिय हुआ है।


 

 

  तीन कविताएँ

१

मैंने देखा है दूर कहीं परबतों के पेड़ों पर
शाम जब चुपके से बसेरा कर ले
और बकरियों का झुंड लिए कोई चरवाहा
कच्ची-कच्ची पगड़ंड़ियों से होकर
पहाड़ के नीचे उतरता हो
मैंने देखा है जब ढलानों पे साए-से उमड़ने लगें
और नीचे घाटी में
वो अकेला-सा बरसाती चश्मा
छुपते सूरज को छू लेने के लिए भागे
हाँ, देखा है ऐसे में और सुना भी है
इन गहरी ठंडी वादियों में गँूजता हुआ कहीं पर
बाँसुरी का सुर कोई
तब
यंू ही किसी चोटी पर
देवदार के पेड़ के नीचे खड़े-खड़े
मैंने दिन को रात में बदलते हुए देखा है!

२

"बहुत घुटी-घुटी रहती हो
बस खुलती नहीं हो तुम!"
खुलने के लिए जानते हो
बहुत से साल पीछे जाना होगा
और फिर वही से चलना होगा
जहाँ से काँधे पे बस्ता उठाकर
स्कूल जाना शुरू किया था
इस जहन को बदलकर
कोई नया जहन लगवाना होगा
और इस सबके बाद जिस रोज
खुलकर
खिलखिलाकर
ठहाका लगाकर
किसी बात पे जब हँसूँगी
तब पहचानोगे क्या?

३

लोग एक ही नजर से देखते हैं
औरत और मर्द के रिश्ते को
क्योंकि उसे नाम दे सकते हैं ना!
नामों से बँधे
बेचारे यह लोग! 

१५ सितंबर २०००
 

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