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गिरधर कविराय की कुंडलिया

 

 

नीति के नौ कुंडलिया


दौलत पाई न कीजिये सपने में अभिमान
चंचल जल दिन चार को ठाँवं न रहत निदान
ठाँव न रहत निदान जियत जग में जस लीजै
मीठे वचन सुनाय विनय सब ही की कीजै
कह गिरधर कविराय अरे यह सब घट तौलत
पाहुन निसि दिन चारि, रहत सबही के दौलत।



बिना विचारे जो करे सो पाछे पछिताय
काम बिगारे आपनो जग में होत हँसाय
जग में होत हँसाय चित्त में चैन न पावै
खान पान, सम्मान, राग-रंग मनहिं न भावै।
कह गिरधर कविराय दु:ख कछु टरहिं न टारे
खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना विचारे।



साईं बैर न कीजिये गुरु, पंडित, कवि, यार
बेटा, बनिता, पैरिया, यग्य करावन हार
यग्य करावन हार, राज मंत्री जो होई
विप्र, परोसी, वैद, आपकी तपै रसोई।
कह गिरधर कविराय युगन तें यह चलि आई
इन तेरह सों तरह दिये बनि आवै सांई।



चिंता ज्वाल सरीर बन दावा लगि-लगि जाय
प्रगट धुआँ नहिं देखियत उर अंतर धुँधवाय
उर अंतर धुँधवाय, जरै जस काँच की भट्ठी
रक्त, माँस जरि जाय रहे पंजर की ठट्ठी
कह गिरधर कविराय सुनो रे मेरे मिंता
ते नर कैसे जियें जाहि व्यापी है चिंता



बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेई
जो बनि आवै सहज ही, ताही में चित देइ
ताही में चित देइ, बात जोई बनि आवै
दुर्जन हँसे न कोय, चित्त में खता न पावै
कह गिरधर कविराय करो यह मन परतीती
आगे को सुख समुझि, होई बीती सो बीती



साईं अपने चित्त की भूल न कहिये कोय
तब लगि घट में राखिये जब लगि कारज होय
जब लगि कारज होय, भूल किससे नहिं कहिये
दुर्जन हँसे न कोय, आप सियरे व्है रहिये
कह गिरधर कविराय बात चतुरन के ताईं
करतूती कहि देत, आप कहिये नहिं सांईं।



पानी बाढै नाव में, घर में बाढै दाम
दोनों हाथ ऊलीचिये यही सयानो काम
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै
परमारथ के काज सीस आगे धरि दीजै
कह गिरधर कविराय बडेन की याही बानी
चलिये चाल सुचाल राखिये अपनो पानी



रहिये लट पट काटि दिन बरु घामें में सोय
छाँह ना वा की बैठिये जो तरु पतरो होय
जो तरु पतरो होय एक दिन धोखा दैहैं
जा दिन बहै बयारि टूट तब जरि से जैहैं
कह गिरधर कविराय छाँह मोटे की गहिये
पाता सब झरि जाय तऊ छाया में रहिये।



साईं इस संसार में, मतलब को व्यवहार
जब लगि पैसा गाँठ में तब लगि ताको यार
तब लगि ताको यार,यार संगहि संग डोलें
पैसा रहा न पास, यार मुख सों नहिं बोले
कह गिरधर कविराय जगत यहि लेखा भाई
करत बेगर्जी प्रीति यार बिरला कोई सांईं।

१० अक्तूबर २०११

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