अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

जीते बेला फूल
 

स्पर्धा थी सौंदर्य की, मौसम था प्रतिकूल
सूखे फूल गुलाब के, जीते बेला फूल

चली चिलकती धूप में, जब मजदूरन नार
अलबेली को देख कर, बेला मानें हार

हरदम हँसता देख कर, चिढ़-चिढ़ जाये धूप
बेला की मुस्कान ने, और निखारा रूप

पहले गजरे की महक, कैसे जाऊँ भूल
सुधियों में अब तक खिले, अलबेला के फूल

मंगल-बेला में हुआ, मन से मन का ब्याह
मन्त्र पढ़े थे नैन ने, बेला बना गवाह

बेलापुर से रामगढ़, चले बसंती रोज
बेला का गजरा लिये, वीरू करे प्रपोज

- अरुण कुमार निगम
२२ जून २०१५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter