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बेला की मन वाटिका
 

अबकी बेला में सखी, छायी खूब बहार
पूर्ण चंद्र सी रात में, महका पी का प्यार

बेला मन की वाटिका, करे करुण संवाद
विरही रातों में पिया!, खूब सताती याद

बेला के हर अंग में, है औषध विज्ञान
यह परमारथि-वैद्य सा, करता रोग निदान

खान रूप सौंदर्य की, भू-जग का शृंगार
गजरे-माला में सजे, गहनों का संसार

करे समन्वय रंग से, पहन श्वेत परिधान
भरे शीशियाँ इत्र की, दे अनंत मुस्कान

कहो मोगरा, मोतिया, बेला के ही नाम
नाम कई हैं ईश सम, किन्तु एक है धाम

अर्द्ध-खुली कलिकाओं में, यौवन चढ़े खुमार
रस पीते लोलुप भ्रमर, कर क्रीड़ा-गुंजार

नारी का भूषण बने, करे केश शृंगार
ख़ूबसूरती के लिए, कुदरत का उपहार

गुच्छों में खिल-खिल खिलें, सहते हैं रवि ताप
कोमल, कमनिय, कांति-से, हरते जन संताप

सजकर पूजा-थाल में, बने मनोरथ फूल
मंदिर-मंडप महकते, महके ईश-दुकूल

- मंजु गुप्ता 
२२ जून २०१५

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