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औरत बेला की तरह
 

औरत होती है बेला की तरह
वैसी ही सुंदर और
गमक से भरी भरी
जिंदगी की धूप
झुलसा देती है जब
तन और मन
जब दूर दूर तक
नज़र नहीं आती है
कोई हरियाली
तब औरत
खोल खोल देती है
अपने स्नेह की पोटली
और बिखेर देती है
अपनी सारी खुशबू
बिल्कुल वैसे ही
जैसे झुलसते दिन
और तपती रातों में
खिल उठते हैं
फूल बेला के

-उर्मिला शुक्ल
२२ जून २०१५

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