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देख मोगरा के फूलों को
 

देख मोगरा के फूलों को
याद बहुत कुछ आये !

तुमने ही रोपा था शायद
पिछले सावन मे
दो पौधे फूलवारी मे
दो भीतर आंगन मे

आज नेह से नापा तो वह
अंकवारी मे आये !

जितनी थी मनुहार तुम्हारी
मीठी बातों मे
उतने बिम्ब दिखाई पड़ते
उनकी पातों मे

मै उसमे उलझा रहता हूं
वह मुझसे बतियाये

जेठ माह की संध्या जो
प्राणों पर भारी है
तुम हो पास नही बैरन
पछुआ हत्यारी है

खिले मोगरा ! प्राण तुम्हारी
खुशबू से भर जाये

देख मोगरा के फुलों को
याद बहुत कुछ आये !

- अजय पाठक
१५ जून २०१५

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