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आदिम गंधी बेला
 

एक बल्ब का बुझना-जलना
पर्दा उठना-गिरना
रेती पर का एक घरौंदा
बनना और बिगड़ना-
वैसा चाँद नहीं है जैसे-
नन्हें हाथ अधेला
मौसम बदले, कुछ पल महके
आदिम गन्धी बेला।।

फिक्र और चिन्ता बस्ते में
बोतल पानी-पानी
कोर-कसर है अभी बहुत,पर
छोटी सी हैरानी-
उसने भी जब मौसम जीया
उगने औ' ढलने का
कतराती फिर क्यों,छोड़ते
कल को,आज-अकेला?

देखो थोड़े स्वप्न बचाओ
कटे परों से ढककर
बिन पूछे घुस आया घर में
पूरा-पूरा दफ्तर
छोटी टीस उमड़ती अन्दर
बाहर आ छितराती
भीतर-बाहर ठहरा पानी
चुपके चलता ढेला

- शुभम् श्रीवास्तव ओम
१५ जून २०१५

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