अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

इतने दिन कहाँ रहे
 

सूखी नदिया, सूखे नाले
सूख गये सब गात
तुमने कैसे जान बचाई
सह इतने आघात

धरती तपती हवा तप रही
ताप के मारे हो जाते गुम

वेणी में सजते हो बेला
महका करता तन मन
बिखराते हो गँध मनोहर
मत्त हो रहे प्रियजन

कलियों में लिख गँध की पाती
प्रणय निवेदन सेतु बने तुम

तेरे से होकर आती वो
पवन कहे उनका आना
नथुनों से उनकी बेला तुम
गुपचुप उर में उतर जाना

कोमल पँखुरियों के संग क्या
स्वेत वसन वैधब्य सहे तुम

- सुरेश पांडा
१५ जून २०१५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter